सोने की चिड़िया कहे जाने वाले देश में चांदी के कौवों का प्रवेश

Thursday, 25 October 2012

जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती बसेरा,
वह भारत देश है मेरा |२|


 वर्तमान की स्थिति को देख कर ऐसा लगने लगा है मानो उपरोक्त पंक्तियाँ कहीं दादी और नानी माँ की लोरियों की जगह ना ले लें | मेरा भारत, मेरे सपनों का भारत, हमारा भारत, हम सबका भारत,  भगत का भारत - बिस्मिल का भारत, चंद्रशेखर का भारत - चाणक्य का भारत, आर्यभट का भारत - बाण भट्ट का भारत, मंगल का भारत – कुंवर का भारत, भरत का भारत और अहिंसावादी भारत | भारत वर्ष ने अपने पन्नों में ऐसे - ऐसे इतिहास को संजोग कर रखा है साथ ही साथ भारत माता ने ऐसे शूरवीर सपूतों को जन्म दिया है की इनके गौरव गाथा को सुनकर हम सब अपने आप में गौरवान्तित महसूस करते हैं |

विदेशी लुटेरों से लुटता भारत, काल - काल से वृहदभारत से सिमटता भारत और फिरंगियों से सिकुड़ता भारत – ठिठुरता भारत |  चाहे वह सिकंदर हो या चंगेज, गौरी हो या गजनी, मुग़ल हो या अंग्रेज |

जब इतिहास की ओर हम झांकते हैं तो हमें देखने को मिलता है की विदेशी ताकत हमारे देश के ऊपर गिद्ध की तरह नज़र गडाये रहे, जब जिसको मौका मिला झपट्टा मार बैठे | सबने हमारे देश को जम कर  लुटा, हमारी संस्कृति और सभ्यता को छिन्न – भिन्न किया |

काग चेष्टा, बको ध्यानम्, श्वान निद्रा तथैव च।
अल्पहारी, गृहत्यागी विद्यार्थी पंचलक्षणम् ।।


उपरोक्त श्लोक वास्तव में विद्यार्थी जीवन पर प्रकाश डालता है, लेकिन अगर गौर किया जाये तो फिरंगी इस श्लोक को व्यापार जगत में इसका बखूबी इस्तेमाल करते चले आ रहे हैं | हमारा देश “ जहाँ डाल डाल पर सोने की चिड़िया करती बसेरा “ | इस सोने की चिड़िया की शक्तियों का आभास सदैव विदेशी ताकतों को ही क्यों होता चला आ रहा है ? हमारा तंत्र अपनी शक्तियों से क्यों नहीं परिचित है ? व्यापार के लिए भारतीय बाजार को सर्वोतम मानकर विदेशी तंत्र गिद्ध की तरह नज़र गडाये रहते हैं और हमारा तंत्र अपनी शक्तियों से अपरिचित होकर बार - बार उन्हें व्यापार के लिए सहमति देते चले आ रहे हैं जिसका खामियाजा हम काल दर काल से भुगते चले आ रहे हैं | हमारे घरेलु बाजार में डॉलर के निवेश से ही हमारा पूर्ण उत्थान होगा ऐसा कहना या सोंचने का तात्पर्य है की देश के सवा अरब आबादी के हाथों को अपाहिज ठहराना | चांदी के कौवों का प्रलोभन देकर साजिश रचने की कोशिश ? वर्तमान की स्थिति को भांपते हुए, इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता की दलाली की बू आती है | हमारे देश से भी काफी छोटे कुछ देशों की अर्थव्यवस्था आज हमसे मजबूत है, ऐसा क्यों है ? इंग्लैण्ड ! जहाँ उसकी धरती पर खनिज सम्पदा का नामोनिशान तक नहीं है | विक्टोरिया ! जिसका पूरे विश्व पर आधिपत्य रहा, जिसके सामराज्य में कभी सूर्यास्त नहीं हुआ | संसार की सबसे प्राचीनतम धर्म, वेद – शास्त्र इत्यादि हमारी है, हमने की पूरे विश्व को अपने ज्ञान की ज्योति से प्रजवलित किया | इसके बावजूद भी फिरंगी ऐसी कौन सी रुपरेखा तयार करते हैं की उनकी विद्या, हमारी अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ती जान पड़ती है |

तक्षशिला नालंदा का इतिहास फिर लौटकर आयेगा

तक्षशिला व नालंदा विश्वविद्यालय के वे पायें आज भी गवाह हैं, की हमने ही पूरे विश्व को अपने ज्ञान रूपी ज्योति से प्रकाशमय किया है | भले ही उन पायों पर आक्रमणकारियों के धुल की चादर चढ गई हों, लेकिन आज भी उनमें जंग नहीं लगी | हमें आवश्यकता है की हम अपने अन्दर छिपे दिव्य शक्तियों से परिचित होकर अपनी प्रतिभा के बल बूते पर अपने राष्ट्र और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में अपनी अहम भूमिका निभाएं |

भारत माता की जय, हिंदुस्तान जिंदाबाद, आर्यावर्त का इतिहास अमर रहे, सूर्य के प्रकाश से जम्बूदीप सदा प्रकाशमय रहे | जय हिंद |

लेखक – संतोष कुमार

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जब चाणक्य ने कर ली तौबा !

Thursday, 18 October 2012

एक रात चाणक्य मेरे सपने में आये, मैंने उन्हें अपने सम्मुख पाकर काफी खुश होते हुए उनका विधिवत तरीके से साष्टांग, प्रणाम - पाति  किया

चाणक्य: कैसे हो ब्रह्मर्षि बालक, सब कुशल मंगल है ना ?

ब्रह्मर्षि बालक: मत पूछिए गुरुदेव, आजकल शिक्षा जगत में बहुत विकट परिस्थिति चल रही है |

चाणक्य: यह बात तो तुम बिल्कुल शत प्रतिशत सच कह रहे हो |  

ब्रह्मर्षि बालक: गुरुदेव बस आप ही एक ऐसे हैं जो इस सम्बन्ध में कुछ कर सकते हैं | आपसे सविनय निवेदन है की आप पुनर जन्म लें और शिक्षा जगत का कल्याण करें

चाणक्य: ब्रह्मर्षि बालक का प्रतिउत्तर देते हुए अपने पंक्तियों के सहारे कुछ इस प्रकार अपनी व्यथा को व्यक्त करते हुए कहते हैं - 

तुमने मुझे मुर्ख समझ रखा है ब्रह्मर्षि बालक
क्या तुम चाणक्य का नाम डूबाओगे ?
चाणक्य का पुनर जन्म कराके
अब उसको भी नियोजित करवाओगे |
मात्र चार हज़ार की सेवा पर
चाणक्य को दर दर की ठोकरें खिलवाओगे ||    

लेखक संतोष कुमार

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पेप्सी कोका कोला

Wednesday, 17 October 2012


चौराहे पर खड़े कुछ मनचले युवकों में से एक कुंवारे युवक ने राह से गुजरती कुछ खूबसरत बालाओं की झुण्ड में से एक अति सुन्दर कन्या की ओर इशारा करते हुए कहता है –

तुम ही हो मेरी पेप्सी कोला (२) 
जिसे देख कर मेरा तन मन डोला ||

मैं पास ही खड़ा यह तमाशा देख रहा था | मुझसे भी रहा न गया, अंततः मैंने भी अपने मन की बात कह ही डाली – 

घबराओ नहीं बालक तुम पेप्सी कोला की बात करते हो (२)
पेप्सी कोला क्या चीज है, एक दिन तुम्हें कोका कोला मिल जायेगी |
कुदरत का करिश्मा कह लो या माया, समय अपना रंग दिखायेगी (२)
एक दिन तुम्हारी फ्रूटी भी इसी राह से गुजरते हुए जायेगी || 

लेखक – संतोष कुमार

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